गैरों पर की विजय किंतु हम अपनों से ही हारे क्यों है।
एक नीड़ है एक खून है फ़िर ये हिंसक बंटबारे क्यों है।
कहाँ जायें किस्से रोएँ दुखडा अपने मन का ,
सरितायें मीठी होती है, फ़िर ये सागर खारे क्यों हैं॥
आइज़ेहा की किताब / ऐन कार्सन / अनिल जनविजय
3 hours ago

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