जीवन मैं कभी न कभी मनुष्य इस संसार को नियंत्रित करने वाली शक्ति का अनुभव अवश्य करता है।
ये आवश्यक नही कि वो इसे साकार, सगुण रूप भगवान् को मने या निराकार, निर्गुण ब्रह्म मैं विश्वास करे।
महत्व तो केवल इस बात का है कि वह ईश्वर की सत्ता मैं आस्था रखता है कि नहीं जो मनुष्य अपने को बहुत विद्वान सिद्ध करने के लिए ईश्वर के अस्तित्व लो नकारते है वे भी विपत्ति आने पर, धन, कुल आदि का नाश होने पर ईश्वर को ही जिमेदार बताते हुए उसे अन्यायकारी होने का दोष लगाते है, तब उनसे अगर पूछा जाए कि यदि ईश्वर है ही नहीं तो वह अन्याय कैसे कर सकता हैं। तब उन पर क्या उत्तर होगा?

अतः मनुष्य को इस सम्पूर्ण विश्व को नियंत्रित और पोषण देने वाली उस ईश्वरीय शक्ति की अनवरत इस अखिल ब्रह्माण्ड को जीवंत, प्रकाशित, पोषित, और सदमार्ग का अनुगमन करने को प्रेरित करने वाली अन्नत अलौकिक सत्ता पर विश्वास रखना चाहिए की परमात्मा सदैव ही उचित, न्यायसंगत ही करता है।
ईश्वर मैं विश्वास मनुष्य को पाप से बचाता है।
ईश्वर मैं विश्वाश मनुष्य मैं आत्मविश्वास की वृद्धि करता है।

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