आख़िर उन बूढी आँखों ने डबडबाना छोड़ दिया ,
जब अपने ही कतरे ने साथ न दिया ,
कलेजे को पत्थर न जाने कब?हो जाने दिया,
जब घर को जलाने मैं ही लग गया घर का दिया॥
डबडबाती तो बे पहले थी, सीं दी थी जब जुबान,
कह कर अब बहुत हो चुका इस घर मैं, मेरा !
अपमान ! देने को फिर इम्तहान , कह दिया
बहु का सही तो है अनुमान, दरवाजे पर अच्छे लगते है दरवान,
सहित सामान , मिल गया मकाम पर, उन बूढी आँखों ने डबडबाना छोड़ दिया॥
डबडबाई तो ये तब भी थी, जब त्योहारों के मौसम,
पेट का चौका (रसोई) किसी देवस्थल की तरह पवित्र ,
रहा गया, जब बेटा का बेटा कह गया - खाना अब नही रह गया।
खिलाये थे कई त्योहार, पर नही खा पाए थे पहली बार,
शाम तक धूम मैं खरीद गए थे सारे बाज़ार , उनकी न याद आयी एक बार।
भूंखी पबित्रता से मना त्यौहार , पर उन बूढी आंखों ने डबडबाना छोड़ दिया॥
कॉस्मॉस / क्रिस्तीना लेनकोव्स्का / संगीता गुप्ता
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