आज मन्दिर मैं मदिरा पुजारी पिए
इसलिए बुझ गए आरती के दिए ॥
आरती से रति है किसी को नहीं।
रो रही भरती माँ इसीके लिए॥
आज मन्दिर.......................
वो सीता सावित्री वो मीरा कहाँ।
वो कथा कहानी बनी रह गयीं॥
द्रोपदी के लिए नाथ आए स्वयम ।
वो मीरा जो प्याला गरल का पिए॥
आज मन्दिर .......................
घर-घर मैं ही घर-घर के घलाक बने।
जो पालक थे वे आज बालक बने॥
धरती धसने लगी पाप के वोझ से।
दींन- दुखियों के दुःख से धधकते हिये॥
आज मन्दिर मैं मदिरा पुजारी पिए ।
इसलिए बुझ गए आरती के दिए
आगुस्तू फ़्रेदेरिको सिमीत
1 week ago

No comments:
Post a Comment